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रूस-यूक्रेन युद्ध का शिकार हुए यूपी के दो लाल, 2 साल बाद ताबूत में आया कंकाल

रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia-Ukraine War) की विभीषिका में फंसे उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के युवाओं की एक बेहद दर्दनाक और झकझोर देने वाली कहानी सामने आई है, जहां बेहतर भविष्य और अच्छी नौकरी की तलाश में गए दो युवकों के…

24GhanteOnline
June 12, 2026
3 min read

रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia-Ukraine War) की विभीषिका में फंसे उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के युवाओं की एक बेहद दर्दनाक और झकझोर देने वाली कहानी सामने आई है, जहां बेहतर भविष्य और अच्छी नौकरी की तलाश में गए दो युवकों के पार्थिव अवशेष करीब दो साल के लंबे और दुरूह इंतजार के बाद उनके पैतृक घर पहुंचे हैं। आजमगढ़ और मऊ जिले के कई सीधे-साधे युवक वर्ष 2024 की शुरुआत में स्थानीय धोखेबाज एजेंटों के झांसे में आ गए थे, जिन्होंने उन्हें रूस में सुरक्षित सुरक्षा गार्ड और हेल्पर की प्रतिष्ठित नौकरी दिलाने का सुनहरा सपना दिखाया था। परिजनों का गंभीर आरोप है कि मऊ निवासी एक मुख्य एजेंट ने मोटी रकम लेकर इन युवाओं को रूस भेजा, लेकिन वहां पहुंचते ही उनके सपनों को कुचल दिया गया और उन्हें कथित तौर पर जबरन रूसी सेना की ट्रेनिंग देकर सीधे जानलेवा युद्ध क्षेत्र (वॉर जोन) में अग्रिम मोर्चे पर झोंक दिया गया, जहां भीषण गोलाबारी के दौरान आजमगढ़ के गुलामी का पूरा निवासी अजहरुद्दीन और मऊ निवासी रामचंद्र की दर्दनाक मौत हो गई।

इस दिल दहला देने वाले हादसे के बाद दोनों युवक लंबे समय से लापता चल रहे थे और युद्ध की विभीषिका के कारण रूस में मारे गए अनगिनत लोगों के शवों के बीच उनकी वास्तविक शिनाख्त करना एक बेहद दुरूह और असंभव कार्य बन चुका था। इस कठिन परिस्थिति में दोनों देशों की सरकारों के सहयोग से अत्याधुनिक डीएनए (DNA) जांच तकनीक का सहारा लिया गया, और मृतक के परिजनों के डीएनए नमूनों का वहां मिले अवशेषों से मिलान होने के बाद ही आधिकारिक तौर पर अजहरुद्दीन और रामचंद्र की पहचान सुनिश्चित हो सकी।

पहचान की यह लंबी वैधानिक और कूटनीतिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद आखिरकार गुरुवार को जिला प्रशासन की विशेष व्यवस्था के तहत वाराणसी एयरपोर्ट से दोनों वीर युवाओं के पार्थिव अवशेषों को सम्मानपूर्वक उनके गृह जनपद लाकर प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में रोते-बिलखते परिजनों को सौंप दिया गया, जिससे पूरे क्षेत्र में भारी शोक की लहर दौड़ गई है।

मृतकों के परिवारों के लिए पिछले दो साल का समय किसी भयावह दुःस्वप्न से कम नहीं था; अजहरुद्दीन के भाई अजीमुद्दीन ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि भाई के अचानक लापता होने के बाद वह अपनी सऊदी अरब की अच्छी-भली नौकरी छोड़कर भारत वापस लौट आया और उसने अपने भाई को ढूंढने के लिए दिल्ली से लेकर रूस तक के विभिन्न सरकारी कार्यालयों, विदेश मंत्रालय और दूतावासों के अनगिनत चक्कर काटे, जिसके बाद जाकर यह कामयाबी मिली है।

पीड़ित परिवारों ने सरकार से करबद्ध प्रार्थना करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर का एक बहुत बड़ा और सुनियोजित मानव तस्करी व धोखाधड़ी का मामला करार दिया है, जिसमें निर्दोष युवाओं को बलि का बकरा बनाया गया।

उन्होंने इस पूरे रैकेट की उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच कराने, उनके बच्चों की जिंदगी बर्बाद करने वाले दोषी एजेंटों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई करने, तथा युद्ध के दौरान मारे गए दोनों युवाओं का बकाया वेतन और अन्य सभी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय दावों का त्वरित भुगतान कराने की पुरजोर मांग उठाई है।

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