24 घण्टे ऑनलाइन

बिना स्नान किए यहां से विदा ले रहे हैं... शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने छोड़ा माघ मेला

माघ मेले में मौनी अमावस्या पर स्नान को लेकर खड़े हुए विवाद के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (Shankaracharya Avimukteshwarananda) ने प्रयागराज से विदाई ले ली है। शंकराचार्य ने बुधवार को बिना स्नान किए ही…

24GhanteOnline
January 28, 2026
2 min read
बिना स्नान किए यहां से विदा ले रहे हैं... शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने छोड़ा माघ मेला

माघ मेले में मौनी अमावस्या पर स्नान को लेकर खड़े हुए विवाद के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (Shankaracharya Avimukteshwarananda) ने प्रयागराज से विदाई ले ली है। शंकराचार्य ने बुधवार को बिना स्नान किए ही संगम नगरी से काशी के लिए प्रस्थान कर लिया है। इससे पहले उन्होंने पत्रकारों से कहा कि जो भी यहां पर हुआ है उसने न सिर्फ उनकी आत्मा को झकझोरा है, बल्कि न्याय और मानवता के प्रति उनके विश्वास पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

दरअसल, मौनी अमावस्या पर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से झड़प के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद (Shankaracharya Avimukteshwarananda) अपने शिविर के बाहर पर बैठे थे और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे थे। इस दौरान माघ मेला प्राधिकरण की ओर से उनके शंकराचार्य होने के प्रमाण मांगे गए थे। जिस पर खूब बवाल हुआ था। अब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अचानक प्रयागराज से जाने का फैसला कर लिया। बताया जा रहा है कि शंकराचार्य ने मंगलवार देर रात अपने शिष्यों और समर्थकों से बातचीत के बाद माघ मेला छोड़ने का फैसला किया था।

माघ मेले को छोड़ने से पहले शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद (Shankaracharya Avimukteshwarananda) ने पत्रकारों से कहा, “हमने अन्याय का विरोध किया है और न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं.. प्रयाग की इस धरती पर लोग आध्यात्मिक शांति के लिए आते हैं। आज ऐसी विपदा और भारी मन लेकर लौटना पड़ रहा है, जिसकी हमने कभी कल्पना नहीं की थी। जो भी यहां पर हुआ है उसने न सिर्फ हमारी आत्मा को झकझोर है, बल्कि न्याय और मानवता के प्रति हमारे विश्वास पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है।”

काशी प्रस्थान करने से पहले शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद (Shankaracharya Avimukteshwarananda) ने कहा, “संगम की इन लहरों में स्नान करना केवल धार्मिक क्रिया नहीं बल्कि आत्मा की संतुष्टि का एक मार्ग भी है… आज मन इतना व्यथित है कि इस संकल्प को अधूरा छोड़कर यहां से विदा ले रहे हैं। जब हृदय में क्षोभ और ग्लानि का ज्वार हो तो स्वजल की शीतलता भी अर्थहीन हो जाती है।”

शंकराचार्य vने यह भी कहा, “हम अपने समाज और सनातन के अनुयायियों के साथ ही मेला प्राधिकरण के अफसरों और शासन तक यह बात पहुंचाना चाहते हैं कि आज हम यहां से जा रहे हैं लेकिन अपने पीछे सत्य की गूंज और वह अनुत्तरित प्रश्न को छोड़कर जा रहे हैं जो प्रयाग की हवा में विद्यमान रहेंगे ही पूरे विश्व के वायुमंडल में मौजूद रहेंगे और उत्तर की प्रतीक्षा करेंगे।”

इस खबर को लाइक और शेयर करें

Comments (0)

0/2000 characters

Facebook टिप्पणियाँ

टिप्पणी करने के लिए Facebook में लॉगिन करें

टिप्पणियां अक्षम हैं। व्यवस्थापक से संपर्क करें।