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गंगा दशहरे पर पूजा के दौरान करें इसका पाठ, धन और खुशियों से भर जाएगा घर

सनातन धर्म में गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) को बड़ी ही श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। इस दिन लोग भारी संख्या में पवित्र गंगा में आस्था की डुबकी लगाते हैं, जिसके चलते गंगा नदी के सभी घटों पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है।…

24GhanteOnline
June 2, 2025
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सनातन धर्म में गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) को बड़ी ही श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। इस दिन लोग भारी संख्या में पवित्र गंगा में आस्था की डुबकी लगाते हैं, जिसके चलते गंगा नदी के सभी घटों पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। इस दिन लोग गंगा नदी में स्नान करने के बाद भगवान शिव की पूजा करते हैं।यहीं इस दिन पितरों के लिए तर्पण करने से पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। उसके बाद जरुरतमंदों को दान देकर पुण्य की प्राप्ति करते हैं। मान्यता है कि इस दिन पूजा के समय इस स्रोत का पाठ जरूर करना चाहिए।

गंगा स्तोत्र


देवि सुरेश्वरि भगवति गंगे त्रिभुवनतारिणि तरल तरंगे।

शंकर मौलिविहारिणि विमले मम मति रास्तां तव पद कमले ॥

भागीरथिसुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमे ख्यातः ।

नाहं जाने तव महिमानं पाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥

हरिपदपाद्यतरंगिणि गंगे हिमविधुमुक्ताधवलतरंगे ।

दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम् ॥

तव जलममलं येन निपीतं परमपदं खलु तेन गृहीतम् ।

मातर्गंगे त्वयि यो भक्तः किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः ॥

पतितोद्धारिणि जाह्नवि गंगे खंडित गिरिवरमंडित भंगे ।

भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये पतितनिवारिणि त्रिभुवन धन्ये ॥

कल्पलतामिव फलदां लोके प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके ।

पारावारविहारिणि गंगे विमुखयुवति कृततरलापांगे ॥

तव चेन्मातः स्रोतः स्नातः पुनरपि जठरे सोपि न जातः ।

नरकनिवारिणि जाह्नवि गंगे कलुषविनाशिनि महिमोत्तुंगे ॥

पुनरसदंगे पुण्यतरंगे जय जय जाह्नवि करुणापांगे ।

इंद्रमुकुटमणिराजितचरणे सुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये ॥

रोगं शोकं तापं पापं हर मे भगवति कुमतिकलापम् ।

त्रिभुवनसारे वसुधाहारे त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे ॥

अलकानंदे परमानंदे कुरु करुणामयि कातरवंद्ये ।

तव तटनिकटे यस्य निवासः खलु वैकुंठे तस्य निवासः ॥

वरमिह नीरे कमठो मीनः किं वा तीरे शरटः क्षीणः ।

अथवाश्वपचो मलिनो दीनस्तव न हि दूरे नृपतिकुलीनः ॥

भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्ये देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये ।

गंगास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरो यः स जयति सत्यम् ॥

येषां हृदये गंगा भक्तिस्तेषां भवति सदा सुखमुक्तिः ।

मधुराकंता पंझटिकाभिः परमानंदकलितललिताभिः ॥

गंगास्तोत्रमिदं भवसारं वांछितफलदं विमलं सारम् ।

शंकरसेवक शंकर रचितं पठति सुखीः त्व ॥

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