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मार्गशीर्ष पूर्णिमा आज, जानें व्रत रखने का महत्व

पूर्णिमा (Purnima) तिथि हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखती है, जो कि शुक्ल पक्ष के समापन का प्रतीक है। पूर्णिमा पर पवित्र नदी में स्नान करने और दान-पुण्य करने से जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। पूर्णिमा के दिन भगवान…

24GhanteOnline
December 3, 2025
2 min read

पूर्णिमा (Purnima) तिथि हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखती है, जो कि शुक्ल पक्ष के समापन का प्रतीक है। पूर्णिमा पर पवित्र नदी में स्नान करने और दान-पुण्य करने से जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और चंद्र देव की आराधना की जाती है। मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा आने वाली है और इस बार यह तिथि दो दिन पड़ रही है, जिसके चलते लोगों में कंफ्यूजन की स्थिति बनी हुई है कि आखिर मार्गशीर्ष पूर्णिमा (Margashirsha Purnima) 4 दिसंबर को है या फिर 5 दिसंबर को। आइए आपको बताते हैं इसकी सही तारीख।

मार्गशीर्ष पूर्णिम (Margashirsha Purnima) कब है?


द्रिक पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष पूर्णिमा तिथि 4 दिसंबर को सुबह 8:37 बजे से शुरू होगी। वहीं, अगले दिन 5 दिसंबर को सुबह 4:43 बजे मार्गशीर्ष पूर्णिमा का समापन होगा। ऐसे में मार्गशीर्ष पूर्णिमा 4 दिसंबर 2025 को मनाई जाएगी और इसी दिन पूर्णिमा का व्रत भी किया जाएगा।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा (Margashirsha Purnima) शुभ मुहूर्त


स्नान-दान मुहूर्त – 4 दिसंबर सुबह 5:10 से सुबह 6:05 मिनट तक।
सत्यनारायण पूजा समय – 4 दिसंबर सुबह 10:53 से दोपहर 1:29 मिनट तक।
चंद्रोदय समय – 4 दिसंबर को दोपहर 4:35 मिनट पर।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा (Margashirsha Purnima) पर भद्रा


मार्गशीर्ष पूर्णिमा (Margashirsha Purnima) पर भद्रा का साया भी रहने वाला है, इसलिए इस दौरान कोई भी शुभ काम न करें। 4 दिसंबर को सुबह 8:36 मिनट से लेकर शाम 6:41 मिनट तक भद्रा का साया रहेगा। हालांकि, इस भद्रा का वास स्वर्ग में रहेगा और इसी वजह से भद्रा का बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा (Margashirsha Purnima) का महत्व


धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मार्गशीर्ष पूर्णिमा की पावन तिथि पर पूजा करने से जीवन में आने वाली परेशानियां दूर होती हैं, बाधाएं कम होती हैं और मानसिक शांति मिलती है। धर्म शास्त्रों में मार्गशीर्ष पूर्णिमा का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है। इसे श्रीहरि विष्णु की कृपा बरसाने वाली पूर्णिमा कहा जाता है। इस अवसर पर स्नान के बाद पितरों के लिए तर्पण और दान आदि करना पुण्य फलदायी माना गया है।

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